रेगिस्तान में आई कैर सांगरी की बहार, बाजार में बढ़ी डिमांड

रेगिस्तान में आई कैर सांगरी की बहार, बाजार में बढ़ी डिमांड
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औषधीय गुणों से भरपूर होने के साथ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के तत्व होते हैं शामिल

मायलावास

इन दिनों ग्रीष्मकालीन महीनों में गांवों में खेजड़ी के वृक्ष सांगरी से लदे हुए हैं। आज यही सांगरी गांवों से निकलकर फाइव स्टार होटल में अपनी जगह बना चुकी हैं, गर्मियों के दिनों में कैर व सांगरी की सब्जी खराब नहीं होती हैं इसलिए लोग इसे बड़े ही चाव से बनाते हैं। कैर व सांगरी का नाम सुनते ही हमारे मन मस्तिष्क में एक झाड़ीनुमा पौधे की तस्वीर नजर आती हैं। दरअसल राजस्थान में उगने वाली कैर व सांगरी की अन्य प्रदेशों में जबरदस्त मांग हैं, सबसे महत्वपूर्ण बात यह हैं यह मारवाड़ में कैर व सांगरी के झाड़ पर पैदा होती हैं यहां तक कि इस पर 50 डिग्री तापमान व बरसात का भी कोई असर नहीं पड़ता हैं। हम इनको सुखाकर कई समय तक उपयोग में ले सकते हैं। एक समय था जब कैर व सांगरी मुफ्त में मिल जाती थी लेकिन इन दिनों इनकी जबरदस्त माँग बनी हुई हैं इसलिए यह बिकने के लिए बाजारों में लाई जाती हैं बाजार में आज इसका अचार बनाने के लिए खरीद रहे हैं साथ ही इनको कच्ची तोड़कर सुखाने के बाद सब्जी बनाने के भी काम आ जाती हैं। 

 

वर्तमान पीढ़ी का रुझान कम

एक समय था जब बुजुर्ग इसका सब्जी के रूप में उपयोग करते थे लेकिन वर्तमान पीढ़ी का इस तरफ रुझान कम होता जा रहा हैं इसलिए मारवाड़ क्षेत्र के घरों में अब इसकी सब्जी व आचार नाम मात्र के बनते हैं आजकल पर्याप्त मात्रा में रोजगार उपलब्ध नहीं होने की वजह से स्थानीय लोग इसे सहेजने में रुचि नहीं रखते हैं क्योंकि इतने समय में वे भी अन्य कामों में समय लगाकर ज्यादा कमाई कर सकते हैं। आज बहुत ही कम लोग इसका काम करते हैं जिनसे उनकी ठीक ठाक कमाई हो जाती हैं।

 

खाद और दवा का नहीं होता प्रयोग

कैर-सांगरी वैसे तो राजस्थान में सीजन में आते हैं, तब इनकी सब्जी और अचार बनाया जाता है। वहीं कैर-सांगरी जब सूख जाते हैं, इसके बाद बनने वाली सब्जी ज्यादा स्वादिष्ट होने के कारण पसंद की जाती है। सूखे कैर-सांगरी की सब्जी कभी भी बनाई जा सकती है। खासकर बड़े आयोजन में पंचकूटा की सब्जी में मुख्यत: कैर-सांगरी ही होती है। यह विशेषकर राजस्थान में ज्यादा प्रचलन में है। सांगरी और कैर का उत्पादन प्राकृतिक रूप से होता है। इसके लिए किसी तरह की खेती नहीं करनी पड़ती है। इसमें किसी तरह की खाद और दवा का प्रयोग नहीं होने से यह सब्जी पूरी तरह से शुद्ध होती है।

संपादक: भवानी सिंह राठौड़ (फूलन)

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