डोडा पोस्त की खतरनाक बेड़ी, बेहाल हो रहे बुजुर्ग नशेड़ी।       

डोडा पोस्त की खतरनाक बेड़ी, बेहाल हो रहे बुजुर्ग नशेड़ी।       
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पोस्त के बुजुर्ग नशेड़ियों की हालत खराब, गोलियों के सहारे गुजार रहे जिंदगी

फलसूण्ड़

पिछले लगभग दस साल से डोडा पोस्त पर सरकारी पाबंदी व लाइसेंस प्रक्रिया बन्द करने के कारण बुजुर्ग लोगो की हालत खस्ता है। तहसील मुख्यालय से लेकर गांव से लेकर ढाणीयों मेरे दुकान के पास एक 65 वर्षीय बुजुर्ग रहते है। जो पिछले पैतीस सालों से डोडा पोस्त के आदी थे। लेकिन राजस्थान सरकार ने डोडा पोस्त को पूरी तरह से बंद कर दिया। इसके बाद सरकार ने आबकारी विभाग के सहयोग से डोडा पोस्त के लाईसेंसधारियों के लिए यह नशा छुड़वाने के केम्प कई चरणों में लगाए। और डोडा पोस्त मुक्त की घोषणा कर दी। लेकिन हकीकत मैने मेरे पड़ोस में रहने वाले बुजुर्ग में देखी। उन्होंने केम्प से दवाईयां ली। लेकिन उनकी हालत बहुत खराब है। जब सुबह उनके नशे का समय होता है। तो उनकी स्थिति दयनीय हो जाती है। कई बार तो चिल्लाने लग जाते है। तथा पूरा शरीर जाम हो जाता है। ऐसे में उन्हें कई बार नशे की गोलियां खानी पड़ती है। वो एक तरह से मानसिक व शारीरिक दोनो तरीके से बीमार नजर आते है। कई नशेड़ियों की हालत यह हो गई है। कि न तो उन्हें इलाज के लिए ले जाने वाला है और न वे खुद जाना चाहते है।

 

बाड़मेर, जैसलमेर में नशेड़ियों की संख्या ज्यादा।

डोडा पोस्त के नशेड़ियों की संख्या बाड़मेर व जैसलमेर जिले में सबसे ज्यादा है। जब से राज्य सरकार ने डोडा पोस्त की सरकारी दुकानें बंद की है। तब से उनके हाल बड़े ही खराब है। इस नशे की चपेट में युवा वर्ग भी काफी संख्या में है। ऐसे में सरकार ने सिर्फ उन लोगों के लिए केम्प लगाए। जो डोडा पोस्त के लाईसेंसधारक थे। जबकि इसके अलावा हजारों की संख्या में युवा और बुजुर्ग इसके आदी है। विशेषकर किसान वर्ग में यह नशा काफी प्रचलित है। ऐसे में उन लोगों को लेकर सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया।

मानसिक व शारीरिक असर।

जो लोग पिछले तीस से पैतीस साल लगातार डोडा पोस्त का नशा करते आ रहे है। उनकी अब उम्र साठ से पैसठ साल के बीच पहुंच गई है। ऐसे में न तो उनमें युवाओं जैसा जोश रहा है। और न हीं मानसिक मजबूती। उन लोगों को डोडा पोस्त नहीं मिलने की स्थिति में मानसिक रूप से बीमार रहने लगते है। तथा शरीर काम करना बंद कर देता है। ऐसे में उनका उठना, चलना फिरना मुश्किल हो जाता है। जो लोग जिले से बाहर जाकर नशा छोड़ने का प्रयास कर रहे है। उनमें कई युवा तो नशा छोड़ने में सफल हो गए। लेकिन बुजुर्ग इसको छोड़ नहीं पा रहे है। ऐसे में उनको दी जाने वाली दवाइयां भी आम अस्पताल में नहीं मिलती। और आम डॉक्टर भी इसके लिए दवाईयां नहीं लिख सकता। दवाईयों का डोज भी इतना भारी होता है कि वो नशेड़ी को डोडा पोस्त जितना ही नशा देता है, ऐसे में हम कह सकते है कि डोडा पोस्त छोड़कर दवाईयों का आदी होना और भी खतरनाक है।

 

लम्बे मानसिक इलाज की जरुरत

एक डॉक्टर ने बताया कि नशा दो तरीके से प्रभाव डालता है। मानसिक और शारीरिक। व्यक्ति शराब के आदी है। तो यह मानसिक लत है। इसको नशेड़ी अपनी मनोस्थिति मजबूत करके शराब छोड़ सकता है। उसका शारीरिक रूप से कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। लेकिन डोडा पोस्त व अफीम ये मानसिक व शारीरिक दोनो तरह की लत है। जब इन नशों का आदी व्यक्ति इसे छोड़ने की कोशिश करता है। तो उसका शरीर काम करना छोड़ देता है। हाथ, पैर, ताकत पर असर पड़ता है। उसके चलने फिरने में मुश्किल होती है। ऐसे में डोडा पोस्त का इलाज डॉक्टर की देखरेख में लम्बे समय तक कराने से छोड़ना संभव है। इसके लिए हमेशा डॉक्टर की निगरानी में मानसिक मजबूती मिलती है। जिसके साथ दवाईयों का असर भी होता है। ऐसे में यह नशा छोड़ना संभव हो सकता है। लेकिन ग्रामीण इलाकों के नशेड़ियों के पास न तो इतना धन है कि वो दूसरे शहर जाकर महिनों वहां इलाज करा सके और न ही उनके परिजन इसके लिए तैयार होते है। 

अवैध डोडा पोस्त का कारोबार बढ़ा

राजस्थान सरकार ने डोडा पोस्त बंद करते ही अवैध डोडा पोस्त रखने वाले तस्करों की बले बले हो गई। अब वो अवैध तरीके से डोडा पोस्त लाते है। और हाथो हाथ बिक भी जाते है। जो लोग डोडा पोस्त नहीं छोड़ पाए। उन्हें मजबूरन अवैध तस्करों से मनमांगे रुपए देकर खरीदना पड़ता है। इसके आंकड़े देखें तो पुलिस ने दर्जनों तस्करों को डोडा पोस्त व अफीम की तस्करी करते पकड़ा है। ये ही नहीं कई नए नए तस्कर पैदा हो रहे है। जल्दी धनवान बनने के चक्कर मेें इस कारोबार से युवा लिप्त हो रहे है।

 

केम्प लगाकर कर ली इतिश्री

राज्य सरकार ने डोडा पोस्त बंदी से पहले लाईसेंसधारकों को डोडा पोस्त छुड़वाने के केम्प लगाकर इतिश्री कर ली। लेकिन इसके बाद कोई सुध नहीं ली। लोगों ने नशा छोड़ा या नहीं छोड़ा, इस और सरकार ने विशेष ध्यान नहीं दिया। वहीं नशेड़ियों को दिए गए लाईसेंस आज तक उनके पास ही पड़े है, सरकार ने उन्हें जमा करना भी मुनासिब नहीं समझा।

संपादक: भवानी सिंह राठौड़ (फूलन)

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