संरक्षण के अभाव में विलुप्त हो रहे कागजी बर्तन, सरकार करें प्रोत्साहित

संरक्षण के अभाव में विलुप्त हो रहे कागजी बर्तन, सरकार करें प्रोत्साहित
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यदि सरकार पहल करें तो ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को मिल सकता हैं रोजगार

मायलावास

दशकों पहले ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं रद्दी कागजों व मुल्तानी मिट्टी से अलग-अलग प्रकार के बर्तन बनाती थी, लेकिन आज यह बर्तन गिने चुने घरों में ही देखने को मिलते हैं। रद्दी कागज और मुल्तानी मिट्टी से बनने वाले बर्तनों पर कोई खास लागत भी नही लगती थी। इसको बनाने के लिए महिलाएं रद्दी कागज को गला कर मुल्तानी मिट्टी से तैयार कर बहुत ही सुंदर आकार देती थी। जिससे एक और जहां पर रद्दी कागज के जलने से जो पर्यावरण प्रदूषित होता है, वहीं इसका इस तरीके से उपयोग करने से पर्यावरण की सुरक्षा भी होती है। ऐसे में यदि ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार रद्दी कागज और मिट्टी से बनने वाले बर्तनों को रोजगार के रूप में मान्यता देें तो ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को स्थाई रोजगार भी मिल सकता हैं। लेकिन सरकार द्वारा प्रोत्साहित नही किए जाने से आज यह कला विलुप्ति की कगार पर हैं। जबकि कागज और मिट्टी से कलात्मक बर्तन का निर्माण किया जा सकता हैं जो कि आकर्षक भी लगते हैं। साथ ही कागजों को भी रिसायकल कर इसका सदुपयोग किया जा सकता हैं।

 

प्लास्टिक से ज्यादा बेहतर हैं कागज के बर्तन

दशकों पूर्व ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर बर्तन कागज व मिट्टी के ही हुआ करते थे। लेकिन बदलते वक्त के साथ प्लास्टिक के बर्तनों ने घरों में जगह बना दी हैं। जबकि प्लास्टिक के बर्तनों में केमिकल व रसायन की प्रचुर मात्रा होती हैं। जो की स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

 

सरकार करें प्रोत्साहित

उल्लेखनीय हैं कि आज लोग घरों में एकत्रित रद्दी बाजार में बेच देते हैं। जबकि इसी रद्दी से कम लागत में अलग-अलग प्रकार की कलाकृतियों के बर्तन बनाए जा सकते हैं। पहले कागजों को अच्छे से गलाया जाता हैं फिर इसमें मुल्तानी मिट्टी का घोल मिलाया जाता हैं फिर आकृति बनाकर सुखाया जाता हैं। ऐसे में यदि सरकार रद्दी कागज और मिट्टी से बनने वाले बर्तनों को रोजगार के रूप में मान्यता दे तो ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को स्थाई रोजगार मिल सकता हैं। सरकार ने अगर समय रहते इस कला को प्रोत्साहित नही किया तो एक दिन यह कला विलुप्त हो जाएगी।

 

सालों तक खराब नही होती वस्तुएं

आजकल बाजार में बिकने वाले प्लास्टिक में केमिकल व रसायन की मात्रा होने की वजह से अंदर रखी खाने-पीने की सामग्री खराब हो जाती हैं, जिसे खाने से सेहत पर बुरा असर पड़ता हैं। जबकि मिट्टी से बने बर्तनों में कई सालों तक हम खाने-पीने की सामग्री सुरक्षित रख सकते हैं। आज भी ग्रामीण इलाकों में गिने चुने घरों में यह बर्तन देखे जा सकते हैं, जिसमें महिलाएं अनाज रखती हैं। वहीं इसके अलावा छोटे-मोटे बर्तन देखे जा सकते हैं जो आवश्यकता के अनुसार उपयोग में लिए जाते हैं।

संपादक: भवानी सिंह राठौड़ (फूलन)

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