अनदेखी: नकारे साबित हो रहे लाखों रुपये की लागत से बने सरकारी टांके

अनदेखी: नकारे साबित हो रहे लाखों रुपये की लागत से बने सरकारी टांके
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पानी की बूंद तक संग्रहित नही, जमकर हुआ सरकारी धन का दुरुपयोग

मायलावास

मायलावास गांव सहित आसपास के क्षेत्रों में मनरेगा योजना के अंतर्गत बरसात के पानी को संरक्षित कर उसके उपयोग को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कई योजनाओं को संचालित कर टांको का निर्माण करवाया था लेकिन देखरेख व प्रभावी मोनिटरिंग नही होने की वजह से आज वो टांके नकारे साबित हो रहे हैं। सरकार ने इन टांकों के निर्माण पर लाखों रुपये पानी की तरह बहाये लेकिन आज वो राशि व्यर्थ साबित हो रही है। अधिकांश टांके अब जर्जरावस्था में हैं जो कभी भी हादसे का सबब बन सकते हैं। सरकार द्वारा इन टांको का निर्माण स्कूलों, खेतों, गोचर व ओरण भूमि पर करवाया गया था। जिससे कि पानी को संरक्षित कर आमजन को इसका लाभ मिल सकें। इनमें से कई टांके ऐसे हैं जिनका एक बार भी उपयोग नही हुआ हैं वहीं ज्यादातर टांके पानी की पाइप लाइन से भी नही जुड़ सकें। इतनी बड़ी राशि इन टांको पर पानी की तरह बहाने के बावजूद भी इन टांको में बरसात का पानी संग्रहित नही होना इसके निर्माण कार्य पर सवाल खड़ा करता हैं। एक समय था जब बारिश के मौसम में ये पानी से भरे रहते थे लेकिन घटते जलस्तर की वजह से अब यह टांके सूखे पड़े हैं जिन पर सुरक्षा के लिहाज से कोई ताला नही लगा हुआ हैं ऐसे में इनके अंदर कोई भी जानवर अंदर आकर गिर जाता हैं जिससे कि इनको खोलने पर बदबू आती हैं। बावजूद इसके जिम्मेवारों द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। 

 

देखरेख के अभाव में नकारे साबित हुए

मायलावास सहित आसपास के क्षेत्रों में बनाये गए ज्यादातर टांके आज देखरेख के अभाव में जर्जर हो गए हैं और उपयोगिता की बात तो दूर इन टांको में वर्षा का एक बूंद भी पानी संग्रहित नहीं हुआ। वहीं ज्यादातर टांके जर्जरावस्था में कटीली झाड़ी, पत्थर व गंदगी से अटे पड़े हैं। इनकी सार संभाल करने वाला कोई नही हैं।

 

आखिर टांका बनाने की योजना के पीछे उद्देश्य क्या?

सरकार द्वारा साल दर साल ऐसी जनकल्याणकारी योजनाएं संचालित की जाती हैं, जिससे आमजन को लाभ मिले, जिसमें सरकारी टांका भी एक योजना हैं। इसका महत्व यह हैं कि इसमें पानी संग्रहित हो ताकि पेयजल संबधित समस्या न हो, लेकिन इस योजना की जिम्मेदारी जिनके कंधों पर होती हैं वो खरे नही उतर पा रहे हैं, इसलिए सरकारी टांकों वाली योजना सिर्फ कागजों में ही खानापूर्ति तक सीमित रह जाती हैं। क्योंकि क्षेत्र में ऐसे कई टांके हैं जो लाखों रुपये की लागत से बनाये गए थे, जिनकी सुध लेने वाला कोई नही हैं, आखिर सरकार ने जो जगह तय की वहां क्या सिर्फ टांका निर्माण करना ही उद्देश्य हैं या बनाए गए टांके में पानी संग्रहित हो रहा हैं या नही? और इनसे आमजन को लाभ मिल रहा है कि नही? क्या इनकी मोनिटरिंग करना सरकार का दायित्व नही? यह वाकई विचारणीय हैं जिस पर अमल करना सभी की जिम्मेदारी हैं।

संपादक: भवानी सिंह राठौड़ (फूलन)

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