मायलावास के किसान का नवाचार, घटते जलस्तर में फल फूल रही ड्रेगन फ्रूट की खेती

मायलावास के किसान का नवाचार, घटते जलस्तर में फल फूल रही ड्रेगन फ्रूट की खेती
Spread the love

कम पानी में अधिक पैदावार, एक बार के इन्वेस्टमेंट में 20 साल तक बम्बर आय 

मायलावास

भारत एक कृषि प्रधान देश हैं जहां विभिन्न प्रकार की खेती की जाती हैं। लेकिन बदलते मौसम और अनुकूल वातावरण नही मिलने की वजह से किसानों का खेती के प्रति मोह भंग हो गया हैं। एक समय था जब मायलावास गांव में हर फसल का उत्पादन होता था लेकिन घटते जलस्तर की वजह से किसान अब पारम्परिक खेती को छोड़ अन्य उत्पादन को भी अपने खेतों में जगह दे रहे हैं। दरअसल पश्चिमी मारवाड़ क्षेत्र के मायलावास-मोकलसर क्षेत्र बाजरा उत्पादन के लिए विख्यात है, लेकिन अब यहाँ की धरा पर ताइवान का ड्रैगन फ्रूट पैदा हो रहा है। यह संभव हुआ है किसानों के वैज्ञानिक तरीके से खेती करने से। यह तरीका उनके लिए मुनाफे का सौदा भी बन रहा है। जी हां, हम बात कर रहे हैं सिवाना उपखंड क्षेत्र के मायलावास गांव के किसान मोहनलाल माली की, उन्होंने हाई तकनीक अपना कर अपने खेत में ड्रैगन फ्रूट की खेती की शुरुआत की है। माली ने 2021 से खेत मे ड्रेगन फ्रूट की खेती कर शुरू की थी। अब इसके फल अगस्त माह से लगने शुरू हो जाएंगे। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी ड्रेगन फ्रूट फायदेमंद रहता है। यह फल मधुमेह के असर को कम करता है और कैंसर के सेलों को मारते है और पाचन क्रिया को सही बनाने में सहयोग करता है। यह खेती ज्यादातर चीन व ऑस्ट्रेलिया में होती है। भारत में भी विशेषकर बेंगलुरु साइड में ज्यादा होती है, क्योंकि वहां का तापमान इस खेती के अनुकूल है। मायलावास चौराहा पर अपने खेत मे 2000 पौधों के साथ तीन साल पहले खेती की शुरुआत करने वाले किसान मोहनलाल माली क्षेत्र मे ड्रेगन फल की खेती करने वाले इकलौते किसान है।

 

इनमें होता हैं ड्रैगन फ्रूट का उपयोग

बता दें कि यह एक ताजा फल तो हैं ही साथ ही इसका कई खाद्य सामग्रियों के निर्माण में उपयोग किया जाता हैं। जैसे इसका इसका उपयोग सजावटी पौधों के रूप में किया जा सकता हैं। साथ ही इस फल से आइसक्रीम, जेली, जेम, जूस और वाइन भी तैयार की जाती है। वहीं सौंदर्य प्रसाधन की सामग्रियों में भी इसका इस्तेमाल किया जाता हैं।

 

कब होती हैं इसकी खेती?

ड्रेगन फ्रूट की खेती जहां कम वर्षा होती हैं उन क्षेत्रों में आसानी से की जा सकती हैं। बरसात के मौसम को छोड़ आप किसी भी समय इसका बीजारोपण कर सकते हैं। बावजूद इसके मार्च से जुलाई के बीच का समय इसके बीजारोपण के लिए बहुत अनुकूल हैं। एक बात और इसको सूरज की रोशनी से बचाने के लिए छायादार स्थान पर इसकी खेती करना जरूरी हैं।

 

ऐसे की जाती हैं बीज-पौधे की बुवाई

बुवाई के समय पौधों के बीच की दूरी 2 मीटर की रखनी चाहिए साथ ही पौधरोपण के लिए 60 सेंटीमीटर गहरा और 60 सेंटीमीटर चौड़ा गड्ढा खोदना चाहिए। एक बार पौधरोपण करने के बाद इसकी नियमित देखरेख जरूरी हैं। महीने में एक बार इसे सिंचाई की आवश्यकता होती है। इसके पौधे का तना बहुत कमजोर होता है। इसलिए सीमेंट के खंभे या फिर लकड़ी की सहायता से आप इसे ऊपर की तरफ रस्सी से बांध सकते हैं। 12 से 15 महीने के बाद आपका प्लांट तैयार हो जाता है। 18 माह बाद यह पौधा फल देना शुरू कर देता हैं।

 

20 साल से भी ज्यादा समय तक देता हैं फल

किसान मोहनलाल माली ने बताया कि, एक ड्रैगन फ्रूट का पौधा लगाने के लिए सबसे पहले आरसीसी ढांचे का पिलर बनाया जाता है। क्योंकि यह पौधा आकार में 6 फुट गोलाई लेता है और 20 साल से भी ज्यादा समय तक फल देने की क्षमता होती है। 4 पौधों के बीच इतनी दूरी रखी जाती है कि उन्हें फैलने का पूरा मौका मिल सके।

 

इनका कहना

बाकी फसलों की बजाय ड्रेगन फ्रूट में अच्छी कमाई हैं, इसलिए इस बारे में जानकारी प्राप्त की और फसल उगाई हैं, एक बार फल लिए गए हैं जो लगातार 20 साल से भी ज्यादा समय तक फल देंगे। इसमें पानी की जरूरत भी कम होती हैं, इसकी खेती रिंग बनाकर करनी होती हैं ताकि वहां खाद्य डाल सकें, हमने यहां पर इस फसल के लिए 501 पोल पर 2000 पौधे लगाए हैं जिसमें प्रति पोल पर 4 पौधे लगाए हैं, इससे अच्छे लाभ की उम्मीद हैं।

मोहनलाल माली, ड्रेगन फ्रूट किसान, मायलावास

 

एक्सपर्ट व्यू

कृषि अधिकारी उद्यान बाड़मेर के उत्तम चंद बताते हैं कि बाड़मेर में ड्रैगन फ्रूट की खेती का नवाचार होना अच्छे संकेत है। इसकी खेती काफी चुनौती भरी होती है। यह फल उष्णकटिबंधीय शुष्क और आद्र जगहों पर अच्छी तरह से उगता है। पौधे को विकास के लिए लगभग 25 डिग्री सेल्सियस के आसपास का तापमान चाहिए, और जब पौधे पर फल बन रहे होते हैं, तब 30 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान की जरूरत होती है। ड्रैगन फ्रूट अधिकतम 40 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 7 डिग्री सेल्सियस तापमान को भी सहन कर सकता है, जो की बाड़मेर जैसे क्षेत्र में खेती के लिए संभावना पैदा करती है लेकिन उपर्युक्त वृद्धि उत्पादन के लिए अधिक समय तक शुष्क–शीतलन युक्त दिनों की जरूरत होती है।

संपादक: भवानी सिंह राठौड़ (फूलन)

Related articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Don`t copy text!