छह माह का प्रीमेच्योर नवजात शिशु 105 दिन बाद हुआ अस्पताल से डिस्चार्ज, मिली ममता की गोद

छह माह का प्रीमेच्योर नवजात शिशु 105 दिन बाद हुआ अस्पताल से डिस्चार्ज, मिली ममता की गोद
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जिले में अब तक का यह पहला केस

105 दिनों की कड़ी मेहनत लाई रंग, उतार चढ़ाव के बीच नन्हीं जान सुरक्षित

बाड़मेर

राजकीय चिकित्सालय के मातृ एवं शिशु विभाग में एक गर्भवती महिला की मात्र 25 हफ्ते में ही प्रीमेच्योर डिलीवरी हुई। इस दौरान शिशु की स्थिति बेहद नाजुक थी। एक नन्हीं से जान बचाने के लिए चिकित्सकों ने लगातार अपनी देखरेख में 105 दिन तक एसएनसीयू वार्ड में भर्ती रखा। इस दौरान इस मासूम की जिंदगी बचाने में कई बार उतार चढ़ाव आए। चिकित्सकों सहित नर्सिंग ने दिन रात एक किए। मां ने भी पूरा सहयोग किया और हार नहीं मानी। आखिर चिकित्सकों सहित नर्सिंग स्टाफ की मेहनत रंग लाई और शुक्रवार को शिशु अस्पताल से स्वस्थ डिस्चार्ज किया गया। शिशु को एक नया जीवनदान मिलने पर सभी के चेहरों पर खुशी की मुस्कान साफ झलक रही थी। जिले में इस तरह का पहला केस है, जो कि 25 हफ्ते में डिलीवरी हुई और नवजात सुरक्षित डिस्चार्ज किया गया। 

शिशु विभागाध्यक्ष डा हरीश चौहान ने बताया कि सिणधरी के गांव सनपा निवासी कविता पत्नी अशोक कुमार परमार प्रसव पीड़ा के चलते अस्पताल के मातृ एवं शिशु विभाग में भर्ती हुई और मात्र 25 हफ्ते में ही एक नवजात शिशु को जन्म दिया। 23 मार्च को हुई डिलीवरी के दौरान शिशु की स्थिति बेहद नाजुक थी। जिसे एसएनसीयू विभाग में प्रभारी डा पंकज अग्रवाल की देखरेख में यूनिट बी में भर्ती किया। इस दौरान नवजात शिशु का वजन सिर्फ 700 ग्राम था। स्थिति बेहद नाजुक होने के कारण शिशु को ऑक्सीजन पर रखा और मुंह में नली डालकर दूध पिलाया गया। वहीं शिशु को सिर्फ मां के दूध पर ही रखा। इस बीच कई बार मासूम अपनीया के चलते सांस रोक लेता था। शिशु को निमोनिया भी हुआ और वजन भी गिरकर 650 ग्राम हुआ। बावजूद चिकित्सकों सहित नर्सिंग स्टाफ की टीम ने 105 दिन तक पूरी निगरानी रखते हुए इस नवजात शिशु को नया जीवन दिया। डा पंकज अग्रवाल ने बताया कि अब शिशु का वजन 1.5 हो गया है और पूर्ण रूप से स्वस्थ है। शिशु के इलाज के दौरान डा हरीश चौहान, डा पंकज अग्रवाल सहित डा वीरेंद्र सिंगारिया, डा महेंद्र चौधरी, डा शिवजीराम चौधरी, डा जसराज बोहरा, डा दिव्येश सवदहिया, डा रतनाराम, डा यशु, डा युगल, रेजिडेंट तरुण सुथार, अक्षय यादव, प्रशांत शाह, श्यामसिंह, एसएनसीयू नर्सिंग प्रभारी सवाईराम, नर्सिंग अधिकारी मनोज कुमार, किरण विश्नोई, मनमोहन, किशनाराम, जगदीश, मेहबूब खान, मेराज बानू, धनी देवी, कैलाश कुमार स्टाफ इत्यादि का विशेष सहयोग रहा। डाटा मैनेजर अबरार मोहम्मद ने शिशु के माता पिता को शुभकामनाएं पेश करते हुए अनुकरणीय सेवाओं के लिए चिकित्सकों एवं नर्सिंग अधिकारियों का शुक्रिया अदा करते हुए कामयाबी की बधाई दी। 

25 से 34 सप्ताह के बीच जन्मे शिशु के लिए डा हरीश चौहान ने बताया कि 34 सप्ताह से भी कम समय के लिए गर्भ में रहे शिशुओं को गहन देखभाल की जरूरत होती है। ऐसे में उन्हें एनआइसीयू और नर्सरी में रखने की जरूरत पड़ती है। प्रीमेच्योर नवजातों के फेफड़े पूरी तरह से विकसित नहीं होते हैं, जिसकी वजह से उन्हें कई बार ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है। वहीं उन्हें पीलिया और कई तरह के इंफेक्शन होने का भी डर रहता है। ऐसे में उन्हें नर्सरी केयर की जरूरत पड़ती है। 

 

संक्रमण है सबसे बड़ा कारण

डा अग्रवाल ने बताया कि प्रीमेच्योर डिलीवरी का सबसे बड़ा कारण जेनाइटल ट्रेक इंफेक्शन और यूरीनरी इंफेक्शन है। इसलिए गर्भावस्था में इंफेक्शन से बचना बेहद जरूरी है।

जच्चा-बच्चा की सेहत पर पड़ता है असर डा अग्रवाल ने बताया कि समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों का नार्मल डिलीवरी वाले बच्चों से कमजोर होते हैं। इसके साथ ही उनका विकास भी धीरे-धीरे होता है। प्रीमेच्योर डिलीवरी में बच्चे के साथ-साथ मां के स्वास्थ पर भी असर पड़ता है।

मानसिक तनाव व अनुचित खानपान से बढ़ रही प्रीमेच्योर डिलीवरी डा पंकज अग्रवाल ने बताया कि आज दौर में गर्भ के दौरान महिलाओं में बढ़ते मानसिक तनाव और अनुचित खानपान के कारण प्रीमेच्योर डिलीवरी हो रही हैं। जिसमें बच्चे और मां दोनों को खतरा बना रहता है। इसके साथ ही प्रीमेच्योर बेबी के जन्म के बाद विकास करने में भी काफी समय लग जाता है। 

जन्म पर नवजात शिशु की सामान्य स्थिति डा हरीश चौहान ने बताया कि सामान्य गर्भवती महिला की मेच्योर डिलीवरी 37 से 12 हफ्ते में होनी चाहिए। वहीं नवजात शिशु का वजन 2.5 से 3.5 किलो होना चाहिए।

संपादक: भवानी सिंह राठौड़ (फूलन)

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