देखरेख के अभाव में जल स्वावलंबन योजना के तहत बनी नर्सरी बदहाल

देखरेख के अभाव में जल स्वावलंबन योजना के तहत बनी नर्सरी बदहाल
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पहले होती थी देखभाल आज खुले पड़े नर्सरी के मुख्य द्वार, वन व वन्य जीवों को बचाना वन विभाग के लिए बना चुनौती

मायलावास

वन विभाग द्वारा वन्य जीवों के संरक्षण को लेकर पेड़ पौधों के संरक्षण के लिए नित नई योजनाओं को क्रियान्वित किया जा रहा हैं। लेकिन जिम्मेदारों की अनदेखी व निगरानी के अभाव में के वो योजनाएं धरातल पर खरा नही उतर पा रही हैं। जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री जल योजना के अंतर्गत स्वावलंबन अभियान के तहत सिवाना उपखंड क्षेत्र के मायलावास-मोकलसर की सरहद पर कब्रिस्तान से राठोडों वाला बेरा जाने वाले रास्ते पर दो जगहों पर नर्सरी तैयार की गई थी। जिसमें एक पर फेज तृतीय जिसमें 2018-19 में 400 पौधे रोपे गए थे वहीं दूसरी नर्सरी पर जानकारी धुंधली नजर आ रही हैं। इन दोनों नर्सरी में कई प्रकार की प्रजातियों के पेड़ पौधे लगाए गए थे, पेड़ों को कोई नुकशान न पंहुचाए इस हेतु तारबंदी भी की गई थी, वहीं इनकी देखरेख के लिए कार्मिक भी लगाए गए थे लेकिन योजना की अवधि पूर्ण होने के बाद देखरेख नही किए जाने की वजह कई जगहों से असमाजिक तत्वों ने तारबन्दी ही तोड़ दी। मुख्य द्वार के ताले तक टूट चुके हैं जिसके अंदर घुसकर मवेशी पेड़ पौधों को नुकशान पंहुचा रहे हैं। वहीं नर्सरी में पानी की कुंड भी बनी हुई हुई थी, जिसमें पानी भरा जाता था, जिसमें से प्यासे पक्षी पानी पीते थे, लेकिन आज वो कुंड भी खाली पड़ा हुआ हैं, कार्मिको के रुकने के लिए झोपड़ियां भी बनाई गई थी लेकिन आज उनके छपरे भी गायब हैं। विभाग की ओर से गश्त नही होने की वजह कई जगहों पर वन विभाग की भूमि पर जमकर कुल्हाड़ी का वार किया जा रहा हैं। ऐसे में अगर विभाग को वन संपदा को बचाना हैं तो ठोस कदम उठाने होंगे। वहीं दूसरी तरफ क्षेत्र में स्टाफ की कमी भी सामने आई है।

 

कई प्रजातियां नजर ही नही आती

उचित संरक्षण के अभाव में जहां पेड़ पौधे कम हो रहे हैं वहीं वन्य जीवों की संख्या भी कम होती जा रही हैं। जो की प्राकृतिक संतुलन के लिए ठीक नहीं है। पानी की कमी, वन्य क्षेत्रों में व्यवसायिक गतिविधियां बढ़ने, शिकार की बढ़ती संख्या के कारण वन्य जीवों की मौत हो रही है। ऐसे में यदि इसी तरह वन्य जीवों की संख्या में कमी आती गई तो वह दिन दूर नहीं जब यहां के वन्य जीव सिर्फ तस्वीरों में ही दिखाई दें। ग्रामीणो के अनुसार पहले यहां गिद्ध, गोडावण, सेई, लोमड़ी, लकड़बग्घा, हिरण सहित कई प्रकार की वन्य जीवों की प्रजातियां थी, लेकिन आज वो कहीं नजर ही नही आ रही हैं।

 

वन विभाग उठाए ठोस कदम

ग्रामीणों ने बताया कि पहले यहां घना जगंल होने की वजह हिरन और नील गायों के झुंड हुआ करते थे, लेकिन दिनों दिन संख्या में गिरावट देखी जा रही हैं, जिसका प्रमुख कारण हैं जंगलों के कटान, क्योंकि तीव्र गति से हरे पेड़ों पर कुल्हाड़ी चल रही हैं, ऐसे में वन्य जीवों का आश्रय स्थल सिमटता जा रहा हैं, वहीं पानी के अभाव में कई वन्य जीव दम तोड़ चुके हैं, आज भी यहां 20 से अधिक वन्य जीवों का झुंड विचरण करते नजर आता हैं, समय रहते अगर इनको भी सुरक्षित जगह पर नही ले जाया गया तो इनका अस्तित्व भी समाप्त हो सकता हैं, ऐसे में वन विभाग पेड़ पौधों व वन्य जीवों का संरक्षण करें।

 

स्टाफ की कमी की समस्या भी हो सकती हैं वजह?

जानकारी के मुताबिक क्षेत्र के वन विभाग में कर्मचारियों की कमी महकमे के लिए हर साल एक चुनौती खड़ी करती आ रही है। कर्मचारियों की कमी के चलते जहां हर साल वन संपदा वनाग्नि की भेंट चढ़ रही है। वहीं विभाग में तैनात कर्मचारियों के ऊपर से काम का बोझ कम होने का नाम नहीं ले रहा है। क्षेत्र की बात करें तो यहां अधिकांश पहाड़, रेत के धोरे हैं व जंगल कई क्षेत्रफल में फैले हुए हैं, लेकिन कर्मचारियों की कमी और जागरूकता के अभाव के चलते आए दिन वन संपदा घट रही हैं। जिसका निकट भविष्य में प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता हैं। अगर विभाग नई भर्तियों का पिटारा खोलें तो वनों का संरक्षण किया जा सकता हैं।

संपादक: भवानी सिंह राठौड़ (फूलन)

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