परंपरा: अक्षय तृतीया पर नन्हे बच्चों ने स्वांग रचकर दिया बाल विवाह रोकथाम का संदेश

परंपरा: अक्षय तृतीया पर नन्हे बच्चों ने स्वांग रचकर दिया बाल विवाह रोकथाम का संदेश
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बाजारों में दिनभर रही रौनक, किसानों ने खेतों में पूजा अर्चना कर अच्छे जमाने की कामना की

मोकलसर

शुक्रवार को अक्षय तृतीया का पर्व मायलावास, मोकलसर, मोतीसरा, लुदराड़ा सहित सम्पूर्ण क्षेत्र में हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। अक्षय तृतीया के अबूझ सावे के विशेष अवसर पर गांव सहित सम्पूर्ण क्षेत्र में शुभ प्रसंगों का सिलसिला सुबह से लेकर देर रात्रि तक चलता रहा। इस मौके पर चिरंजीवी भगवान श्री परशुराम का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया। इस दौरान विवाह प्रसंग, गृहप्रवेश, यज्ञोपवीत, व्यापार आरम्भ सहित कई नए कार्य किए गए। वहीं किसानों ने अपने खेतों में हल चलाकर अच्छे जमाने के लिए पूजा अर्चना की। साथ ही नन्हे बालक बालिकाओं ने वर-वधु का स्वांग रचकर घर-घर जाकर नेगी ली और बाल विवाह रोकथाम का संदेश दिया। वहीं सरकार ने भी बाल विवाह रोकने के लिए विभिन्न विभागों को जिम्मेदारियां सौंपी थी। इसके लिए कंट्रोल रूम भी स्थापित किए गए थे। ग्रामीणों ने बताया कि साल दर साल इस पर्व की रौनक फीकी पड़ती जा रही हैं। पहले छोटे बच्चे गुड्डा गुड्डी का श्रृंगार करके उनकी रीतिरिवाज के साथ शादियां करवाते थे, घरों में गिलवानी बनाई जाती थी लेकिन बदलते वक्त के साथ काफी बदलाव आया हैं।

 

अक्षय तृतीया से जुड़ी कुछ प्रसिद्ध पौराणिक घटनाएं

मान्यता के अनुसार सतयुग और त्रेतायुग की शुरुआत अक्षय तृतीया के दिन पर ही हुई थी।

हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान विष्णु के छठे अवतार श्री परशुराम भगवान का जन्म हुआ था। परशुराम महर्षि जमदाग्नि और माता रेनुकादेवी के पुत्र थे। यही वजह है कि अक्षय तृतीया के शुभ दिन भगवान विष्‍णु की उपासना के साथ परशुराम जी की भी पूजा करने का विधान बताया गया है।

 

अक्षय तृतीया के दिन पर ही मां गंगा का धरती पर आगमन हुआ था।

अक्षय तृतीया के दिन ही भगवान विष्णु के अवतार नर-नारायण और हयग्रीव का अवतरण हुआ था।

 

इसलिए भी खास हैं अक्षय तृतीया का दिन

इस दिवस को हमारी लोक संस्कृति में विशेष महत्व दिया जाता है, आज भी भगवान परशुराम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। परशुराम, जो पृथ्वी पर अत्याचारियों के संहार, नारी शिक्षा जागरण, और नारी सम्मान के प्रतीक माने जाते हैं, इस दिन के महत्व को और भी बढ़ाते हैं। वहीं आज के दिन, किसान अपने खेतों में जाते हैं और धरती माता की पूजा करते हैं। कलश स्थापित कर प्रतीक के रूप में हल चलाते हैं, जो अच्छी फसल और सुखद बारिश की कामना करते हैं। साथ ही अक्षय तृतीया अबूझ सावो के लिए भी प्रसिद्ध है। इस पवित्र दिन किसी मुहूर्त की आवश्यकता नहीं होती, और दाम्पत्य सूत्र में बंध सकते हैं।

संपादक: भवानी सिंह राठौड़ (फूलन)

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