विलुप्ति की कगार पर गिद्ध, संरक्षण से बचाया जा सकता हैं अस्तित्व

विलुप्ति की कगार पर गिद्ध, संरक्षण से बचाया जा सकता हैं अस्तित्व
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दशकों पहले गिद्ध के झुंडों का यहां होता था बसेरा, आज लड़ रहे वजूद की लड़ाई

मायलावास

क्या आपको गिद्ध याद हैं? शायद याद न हो। लेकिन दशकों पहले ये बड़े आकार वाले, भद्दे से पक्षी क्या गांव और क्या शहर। लगभग हर जगह पर देखे जाते थे। कभी पेड़ों पर, कभी बिजली के खंभों पर, कभी पहाड़ियों पर यहां तक कि घरों की छत पर भी इन्हें देखा जाता था। सड़क किनारे किसी मृत जानवर की लाश को घेरे गिद्धों का झुंड या फिर आसमान में गोल-गोल चक्कर काटते गिद्धों का दिखना एक आम बात थी। लेकिन आज यदा कदा ही ही नजर आते हैं। दरअसल सिवाना उपखंड के मायलावास सहित आसपास के क्षेत्रों में बहुतायत में गिद्ध देखने को मिलते थे। लेकिन आज ऐसा लगता हैं कि यहां से यह प्रजाति ही विलुप्त हो गयी। दिनभर जहां कहीं मवेशी का शव का मिलता था वो अपना भोजन करने पहुंच जाते थे फिर यहां छप्पन की पहाड़ियों में बसर करते थे। जिनका प्रमाण आज भी इन पहाड़ियों में देखने को मिलता हैं। दरअसल गिद्ध की चोंच लंबी होती हैं जिससे वे मृत जानवर के शव को नोचकर खाने के बाद भी स्वच्छ रहते हैं। गिद्ध भोजन करने के पश्चात तुरंत स्नान करना पसंद करते हैं जिससे भोजन के दौरान शरीर पर लगे रक्त को पानी से धो सकें और ऐसा करके वे कई बीमारियों से अपना बचाव करते हैं।

 

दशकों पहले झुंड नजर आते थे आज दृश्य ही दुर्लभ

गिद्ध ऊंची उड़ान भरने में दक्ष होते हैं। आसमान की ऊंचाई से उनकी तीक्ष्ण नजर भोजन हेतु जानवरों के शव ढूंढ लेती है। एक जमाने में यहां बहुत गिद्ध पाए जाते थे क्योंकि यहां पहले प्रचुर मात्रा में पानी था और किसान अच्छी पैदावार करते थे इसलिए उनके पास बड़ी संख्या में मवेशी भी होते थे इसलिए उनके मरने पर उनको पर्याप्त मात्रा में शव मिल जाते थे। दशकों पहले हर जगह पर जहां किसी पशु का मृत शरीर पड़ा रहता था, वहां शव भक्षण करते गिद्ध हम सभी ने देखे हैं किंतु अब यह दृश्य दुर्लभ हो गए हैं। पशुओं के मृत शरीर कई दिनों तक लावारिस पड़े रहकर वायुमंडल में दुर्गंध व प्रदूषण फैलाते रहते हैं। इसका मुख्य कारण दिन प्रतिदिन गिद्धों की घटती संख्या है। और इनकी संख्या घटने के कारण मृत शरीरों का निस्तारण बड़ी समस्या हैं।

 

संरक्षण की दरकार

दिनों दिन गिद्धों की संख्या कम होना वास्तव में गंभीर चिंता का विषय है और यदि यह क्रम जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हम गिद्ध को केवल पुस्तकों में पढ़ने तक ही सीमित हो जाएंगे। इसलिए सरकार को इनके वजूद को बनाये रखने के लिए उचित संरक्षण की दिशा में कार्य करना चाहिए।

 

सफाईकर्मी की दी जाती हैं उपमा

गिद्धों की संख्या में कमी की वजह स्वास्थ्य संकट और सांस्कृतिक उथलपुथल भी हैं। गिद्धों को प्रायः प्रकृति का सफाईकर्मी कहा जाता है। क्योंकि वे बड़ी तेजी और सफाई से मृत जानवर की देह को सफाचट कर जाते हैं और इस तरह वे मरे हुए जानवर की लाश में रोग पैदा करने वाले बैक्टीरिया और दूसरे सूक्ष्म जीवों को पनपने नहीं देते। लेकिन गिद्धों के न होने से टीबी, एंथ्रेक्स, खुर पका-मुंह पका जैसे रोगों के फैलने की काफी आशंका रहती है। इसके अलावा चूहे और आवारा कुत्तों जैसे दूसरे जीवों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई। इन्होंने बीमारियों के वाहक के रूप में इन्हें फैलाने का काम किया।

 

पौराणिक कथाओं में भी होता हैं गिद्ध का जिक्र

गिद्ध का पौराणिक कथाओं में भी जिक्र किया हैं, मान्यता के अनुसार जैसे रामायण के कथानक में एक स्थान पर जटायु का जिक्र आता है। जटायु यानी एक गिद्ध, जिसमें आकाश मार्ग से सीताहरण के दौरान रावण से टक्कर ली। मान्यता है कि जटायु आसमान में उड़कर बड़े इलाके की जानकारी और रास्तों का अंदाजा राम और उनकी सेना को देता था, ताकि सीता को खोजा जा सके। कई क्षेत्रों में गिद्ध को शुकुन के तौर पर भी देखा जाता हैं।

संपादक: भवानी सिंह राठौड़ (फूलन)

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