पाताल में पहुंचा पानी….वर्ष 1984 में भूगर्भीय जल का दोहन 32 से बढ़‌कर हुआ 121 प्रतिशत, अब तो जागो

पाताल में पहुंचा पानी….वर्ष 1984 में भूगर्भीय जल का दोहन 32 से बढ़‌कर हुआ 121 प्रतिशत, अब तो जागो
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सिवाना उपखंड में भूगर्भीय जल का स्तर बीते दो दशकों में 90 से घटकर पहुंचा 500 फीट

मोकलसर

सिवाना उपखंड क्षेत्र में लगातार भूगर्भीय जल के दोहन के कारण जलस्तर तीन से चार गुना गिर गया है। लगभग दो दशक पूर्व जहां 90 से 100 फीट की खुदाई पर ही पानी मिल जाता था, वहीं आज 500 फीट की खुदाई के बावजूद भी पानी मिलने की उम्मीद कम ही रहती है। घटते जलस्तर को लेकर विभाग चिंतित नजर नहीं आ रहा है। जलस्तर गिरने का मुख्य कारण पानी का अधिक मात्रा में जलदोहन होना है। सिवाना क्षेत्र में वर्ष 1984 में उपलब्ध पानी का 32% ही जल दोहन हो रहा था, जो अब 121% हो रहा है, यानि कुल वार्षिक पुनर्भरण की तुलना में 8 मिलियन घनमीटर भूजल अधिक निकाला जा रहा है। प्रतिवर्ष 1.30 मीटर भूजलस्तर में गिरावट हो रही है। इसी प्रकार भूजल निकाला जाता रहा रहा तो 5 से 8 वर्षों भूजल भंडार खत्म हो जाएंगे।

 

सिवाना क्षेत्र में भाखरड़ा बेल्ट सहित कुछ गांवों में भी पानी पाताल में पहुंच गया है। अतिदोहन से भूजल स्तर गिरने के कारण गहराई में भूजल खारा होने की आशंका बढ़ जाती है। वर्तमान समय मे राखी गांव सहित आसपास के क्षेत्र में फ्लोराइड की मात्रा 2 एमएल प्रतिलीटर से अधिक पाई गई है। पेयजल में 1 1.50 एमएल प्रतिलीटर से अधिक होने से हड्डी एंव दंत जनित बीमारियां हो जाती हैं।

 

बावड़ियों व कुओं की उपेक्षा से खत्म हो जाएंगे भूजल स्रोत

वार्षिक पुनर्भरण की तुलना में जमीन से निकाला जा रहा है 8 मिलियन घनमीटर ज्यादा पानी, सामूहिक प्रयास जरूरीः जमीन वार्षिक पुनर्भरण से कई गुणा पानी का दोहन हो रहा है। ऐसे में तालाबों,बावड़ियों आदि का जीणोंद्धार करना, बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति को अपनाकर पानी की 40 से 60% तक बचत की जा सकती है। कम पानी के उपयोग वाली फसलों को उगाकर लगभग 130 से 40% तक पानी बचाया जा सकता है, साथ ही घरों में वर्षा जल संग्रहण के लिए व्यवस्था करना, ताकि घरेलू कार्य के लिए भूजल दोहन के दबाव को कम किया जा सके। इसके साथ सरकार को सरकारी एंव निजी ट्यूबवेल खुदाई पर भी रोक लगानी चाहिए।

 

सिवाना (क्षेत्रफल): 1981.52 वर्ग किमी

कुल भूजल क्षेत्रः 1425 वर्ग किमी

खारा पानीः 556.52 वर्ग किमी

औसत वर्षा (वा.): 311.10 एमएम

जलदोहनः 121 प्रतिशत

मोकलसर की प्राचीन बावड़ी खो रही है अपना अस्तित्व

राजस्थान में बावड़ी निर्माण की परम्परा अति प्राचीन हैं l इसी क्रम में बालोतरा जिले में मोकलसर की पग बावड़ी ऐतिहासिक,प्राचीनतम धरोहर एवं त्रिवेणी संगम का अनुपम उदाहरण है l यह एक बेहतरीन दर्शनीय एवं पेयजल स्थल पुनः बन सकता है l वर्तमान समय में इस बावड़ी की उचित देखभाल की आवश्यकता है क्योंकि धीरे-धीरे यह बावड़ी अपना अनोखा रूप खोती जा रहीं हैं l

इनका कहना

 प्राकृतिक संसाधन पैदा नहीं किए जा सकते हैं, लेकिन समुदाय के प्रयासों से भूजल संरक्षित एवं पुनर्भरण किया जा सकता है, इसलिए जल संरक्षण करें तो ही इस संकट से निपटा जा सकता है। अब समय आ गया है कि ‘जितना बचाओगे-उतना पाओगे’ की धारणा पर कार्य करना होगा। 

कुमार जीत

शिक्षाविद,जल संरक्षण एंव पर्यावरणविद विश्लेषक

 

जल संरक्षण को लेकर आमजन को जागरूक होना जरूरी है। सरकार के साथ-साथ सामाजिक संस्थाओं को इन पौराणिक बावड़यों, कुओं तालाबों और पोखरों का जीणोंद्धार करना चाहिए, साथ ही धरो में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम सहित बांध बनाकर पानी का संग्रहण करना चाहिए, ताकि भूतल रिचार्ज हो सके।

प्रियंका राजपुरोहित

भूजल विभाग जेएनवीयू जोधपुर

संपादक: भवानी सिंह राठौड़ (फूलन)

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